Gurugram

1947 के विभाजन का दर्द, बुजुर्गों की जुबानी – किशन चन्द कोटी

Kishan Chand Koti. 1947

गुरुग्राम : 1947 – किशन चन्द कोटी का जन्म 01-05-1932 को गाँव कोट कसरानी तहसील तौंसा (संघर तहसील) जिला डेरा गाजी खान में हुआ था | भारत को भंडित करने के समय मेरी आयु लगभग 15 साल की थी | मैंने लाहौर विश्वविद्यालय से आठवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी | हमारा गाँव लगभग मुस्लिम आबादी का था | हमारे गाँव में लगभग 150 हिन्दू परिवार थे, लेकिन कम संख्या के कारण हम उनसे लड़ाई-झगड़े नहीं कर सकते थे |

15 अगस्त 1947 से पहले हमारे गाँव में मुस्लिम लीग का जबरदस्त प्रचार हुआ औए हिन्दुओं के परिवारों को जीने की इच्छा ना के बराबर थी | परमात्मा की कृपा से मुसलमानों में कुछ अच्छे सरदार भी थे जिक्स नाम अमीर मुहम्मद खान था और उसका भतीजा मंज़ूर अहमद खान था, जो पक्का मुस्लिम लीगी था |

हमारे गाँव में हिन्दुओं को मार-काटने का डर अधिक बढ़ गया था अपितु श्री अमीर मुहम्मद खान ने जब जान लिया कि अब हिन्दुओं के बचने की आशा नहीं थी तो उन्होंने हिन्दुओं को बचाने के लिए एक मस्जिद में हिन्दुओं को इकठ्ठा किया और उनको कहा कि अब जान-माल का खतरा बढ़ गया है इसलिए आप को चुपचाप घर छोड़कर चले जाना चाहिए |

श्री अमीर मुहम्मद खान ने उर्दू जुबान का एक शेर पढ़ा , जो इस प्रकार है :-
आह, जाती है फ़लक पर रहम जाने के लिए,
बादलों हट जाओ, दे दो रास्ता हिन्दुओं को जाने के लिए
उनके आवाहन पर सभी हिन्दू जाने के लिए तैयार हो गए और घर बार छोड़ दिए | केवल हिन्दुओं का एक ही परिवार श्री मेहर चन्द कुमार व श्री नेबराज वहाँ रह गये जो अब इस समय मुसलमान बन कर रह रहे है | गाँव का एक ओर व्यक्ति श्री जेसाराम फती भी नहीं आया, वहां रह गया |

तौंसा शरीफ़ से कुछ हिन्दू डेरा गाजी खान बस द्वारा जा रहे थे, रस्ते में मुसलमानों ने बस को रोक कर हिन्दुओं को तलवारों से काट दिया, उसमें हमारे गाँव का एक व्यक्ति श्री जेसाराम कुमार को मौत के घाट उतार दिया | उसका एक पोता सेक्टर-4 में रहता है और वह रेलवे से रिटायर्ड है |

डेरा गाजी खान से चल कर मुजफ्फरगढ़ पहुँच गये थे और वहां हिन्दुओं का शिविर लगा हुआ था और हमें उसमें डाल दिया | उस दिन रात को मुसलमानों ने हमला कर दिया और उस हमले में कई हिन्दू मारे गये थे | हमले के दौरान भारतीय फ़ौज जो मुज्जफरगढ़ में थी उन्होंने उस बदमाशों का पीछा किया और गोली चलाई जिसके कारण 11 बदमाश मारे गये थे |

वह नजारा बड़ा भयानक था, भय के कारण परिवार सहित बड़ी कठिनाई के कारण रेलगाड़ी में बैठ गये थे | रास्ते में रेलगाड़ी में हिन्दुओं को काट-काट कर चले जाते थे और सारी गाड़ी को काट देते थे और कटी हुई गाड़ी को भारत भेज देते थे | परमात्मा का कोटि-2 धन्यवाद कि हमारी गाड़ी को कोई हानि नहीं पहुंची | हमारी गाड़ी इसलिए बच गई थी कि भारत से मुसलमानों की कटी गाड़ियाँ आ रही थी | इस खतरे को भापकर मुसलमानों ने गाड़ियों को काटना बंद कर दिया |

परमात्मा का धन्यवाद है कि हम बचकर भारत पहुँच गये |अंत में सारांश यह है कि मुसलमानों का राज कितना अच्छा हो फिर भी वे हिन्दुओं को काफ़िर समझते है और घृणा की दृष्टि से देखते है | परमात्मा का कोटि-कोटि धन्यवाद है कि हम भारत में वहाँ से अपना जीवन, शुद्ध व पवित्र ढंग से निर्वाह कर रहे है | देश के बंटवारे के साथ कुछ वर्षों तक हमें बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ा |

बारिश, आँधी और विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित थे | बड़ी मेहनत कर के अपना पेट पालते थे और तो और पढ़ने के लिए पैसा नहीं था कुलीगीरी करके पढ़ाई को जारी किया और मार्च 1951 में दसवीं की परीक्षा दी और जून1951 में द्वितीय श्रेणी में पास हो गया था | सर्वप्रथम मैं अनट्रेंड टीचर के रूप में कैममकाम (वहीं रह कर) मुख्याध्यापक के रूप में सोतई गाँव तहसील बल्लभगढ़ में 5 महीने श्री दौलतराम मुख्याध्यापक की छुट्टी पर जाने के समय काम किया था | लिखने के लिए तो बहुत कुछ है परन्तु समय का अभाव होने के कारण अधिक नहीं लिख सकते | आप सभी मित्रों और सामजिक काम करने वालों को मेरी ओर से बहुत – बहुत धन्यवाद |

Translated by Google

Gurgaon : 1947 – Kishan Chand Koti was born on 01-05-1932 in village Kot Kasrani Tehsil Taunsa (Sanghar Tehsil) District Dera Ghazi Khan. I was about 15 years old at the time of partition of India. I had passed 8th class examination from Lahore University. Our village was almost of Muslim population. There were about 150 Hindu families in our village, but we could not fight with them because of our small numbers.

Before August 15, 1947, there was tremendous propaganda of Muslim League in our village and the desire of Hindu families to live was negligible. By the grace of God, there were some good Sardars among the Muslims, whose name was Amir Muhammad Khan and his nephew was Manzoor Ahmad Khan, who was a staunch Muslim Leaguer.

The fear of killing Hindus in our village had increased, but when Mr. Amir Muhammad Khan came to know that there was no hope of saving Hindus, he gathered Hindus in a mosque to save Hindus and told them that Now the danger of life and property has increased, so you should leave the house quietly.

Mr. Amir Muhammad Khan read a sher in Urdu language, which is as follows:-
Ah, goes to the plane to be kind,
Go away the clouds, give way to the Hindus
On his call, all the Hindus got ready to go and left their homes. Only one family of Hindus Mr. Mehar Chand Kumar and Mr. Nebraj remained there who are now living as Muslims. Another person of the village Mr. Jesaram Fati did not even come, he stayed there.

Some Hindus were going from Taunsa Sharif to Dera Ghazi Khan by bus, on the way Muslims stopped the bus and cut the Hindus with swords, in which a person from our village Mr. Jesaram Kumar was killed. One of his grandson lives in Sector-4 and he is retired from Railway.

Walking from Dera Ghazi Khan reached Muzaffargarh and there was a camp of Hindus and we were put in it. That day at night the Muslims attacked and many Hindus were killed in that attack. During the attack the Indian Army which was in Muzaffargarh chased the miscreants and opened fire due to which 11 miscreants were killed.

That sight was very terrifying, due to fear, along with the family, due to great difficulty, they sat in the train. On the way, they used to go after chopping Hindus in the train and used to cut the whole vehicle and send the chopped vehicle to India. Category-2 thanks to God that no harm was done to our car. Our car was saved because the cut cars of Muslims were coming from India. Sensing this danger, the Muslims stopped cutting the vehicles.

Thanks to God, we have reached India after being saved. In the end, the summary is that no matter how good the rule of Muslims is, still they consider Hindus as infidels and look at them with hatred. Millions of thanks to God that we are living our lives in India in a pure and holy way from there. With the partition of the country, we had to face a lot of difficulties for a few years.

Were suffering from rain, storm and different types of natural calamities. He used to work very hard to earn his living and there was no money to study further, he continued his studies by working as a porter and took the tenth examination in March 1951 and passed in second division in June 1951. First of all I worked as an untrained teacher at Cammkam (staying there) as Headmaster in Sotai village Tehsil Ballabhgarh for 5 months when Mr. Daulatram Headmaster went on leave. There is a lot to write, but due to lack of time, I cannot write much. Many many thanks to all of you friends and social workers.

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