Gurugram

1947 के विभाजन का दर्द, बुजुर्गों की जुबानी – ठाकुर दास खुराना

1947, India

 

Viral Sach – गुरुग्राम : 1947 – मैं ठाकुर दास खुराना सुपुत्र स्वर्गीय श्री पुन्नू राम खुराना को कि महेंद्रगढ़ में रहता हूँ | मुझे श्री राम लाल ग्रोवर एवं श्री जय गोपाल ग्रोवर जो कि गुरुग्राम में रहते है, उन्होंने मुझे बंटवारे से पहले पाकिस्तान में आँखों देखी, सुनी यादें बताने के लिए कहा |

मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि मेरा जन्म गाँव बुजारे, डेरा गाजी खान में हुआ था | मैं 12 साल का था जब पाकिस्तान छोड़ा था | पाकिस्तान में 4 क्लास था पढ़ा था | वहाँ उर्दू में पढ़ाते थे | वहाँ पर हमारा चाँदी का बिज़नस था व लकड़ी के संदूक बेचते थे | स्कूल से पढ़ने के बाद मैं अपने पिताजी के साथ व्यापार में हाथ बंटाता था |

वहाँ पर हकीम जो कि अब डॉक्टर है, नब्ज़ व कपड़ो को देख कर बता देते थे कि रोगी को क्या बीमारी है | आज की तरह नहीं कि पहले सारे टेस्ट करवाओ, फिर भी कई बार डॉक्टर लोग समझ नहीं पाते कि क्या बीमारी है | यहाँ से, वहाँ हकीम बहुत अच्छे थे |

वहाँ पर 8-10 साल के बच्चों यानि लड़कों-लड़कियों में कोई भेदभाव नहीं होता था | सभी एक साथ मिलकर खेलते थे, रस्सी कूदना, पींग झुलना आदि खेल होते थे |

मुस्लिम समुदाय का प्रिय खेल “दोदा” होता था | इस खेल को देखने के लिए हजारों लोग इकट्ठे होते थे, ऐसे ही वहाँ शादियाँ भी धूम-धाम से मनाई जाती थी | महीनों पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थी | दूर-दराज से रिश्तेदार 15-20 दिन पहले ही आ जाते थे | रात को औरतों का गीत-संगीत होता था | दामाद अक्सर इन दिनों रूठे हुए नज़र आते थे | उनको बड़े बुजुर्ग मना कर ही काम शुरू करते थे |

गाँव में रेडियो किसी के घर नहीं होता था | जब कभी कुछ सुनना चाहते तो साथ वाले गाँव में जाना पड़ता था | अखबार भी कहीं-कहीं मिलता था | दिन ढलते-2 यह कई बार सन्देश मिलता कि साथ गाँव में हमला हो गया | कई लोग घायल हो गये | बहुत से जख्मी हो गये | गम की लहर दौड़ पड़ती थी |

एक रात हमारी बस्ती में हमला हो गया, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे जोर से सुने जाने लगे | हमारे सभी पडोसी छत पर इकट्ठे हो गये और सुरक्षित स्थान पर जाने की सोचने लगे | थानाध्यक्ष ने ऐलान किया कि सभी हिन्दू परिवार वहोवा पहुंचे और वहाँ पर उनकी सुरक्षा होगी | छोड़ने का दिन निश्चित हो गया और हम पुलिस की निगरानी में वहोवा पहुँच गये |

कई जगह तनाव हुआ परन्तु हमारा गाँव लगभग शांत रहा और कोई बड़ी वारदात नहीं हुई | वहोवा में कुछ दिन ठहरने के बाद हमें लॉरियों में भर कर डेरा गाजी खान लाया गया | हमारे सामान की पूरी तलाशी ली गई कि हमारे पास हथियार ना हो |

हम परिवार को एक ट्रंक, एक बिस्तर और एक छोटी बोरी बर्तनों की ले जाने की इजाजत दी गई | हम वहाँ पर अपना व्यापार जोकि चाँदी का था व लकड़ी का संदूक का था, वह सब कुछ छोड़ कर आये | उस समय अपनी जान बचानी थी | मिलिट्री के सिपाही हमारी सुरक्षा ले लिए लगा दिए | मुजफ्फरगढ़ से हमें रेलगाड़ी में लादकर भारत के लिए रवाना किया गया |

यह बहुत दुखदायी व दर्दनाक समय था | भरोसे और विश्वास का इतना आभाव था कि रेलगाड़ी में हम सभी लोग सोचते थे हम ठीक भारत में पहुंचेंगे भी या नहीं | रेलगाड़ी को कई घंटों तक लाईन क्लियर नहीं दिया गया |

प्लेटफार्म पर दंगाई की भीड़ होने लगी उनके पास हथियार थे | हमें अपना अंत नज़र आ रहा था | हम भगवान् को याद करने लगे कि अब भगवान् ही हमें कत्लेआम से बचा सकता है | मिलिट्री की टीम के इंचार्ज ने सूझ-बुझ से काम लिया और लाईन क्लियर करवाई | जब गाड़ी अटारी पहुंची तो वहाँ के लोगों ने खासकर सिख समुदाय ने हमारा बड़ा स्वागत किया और सभी सुविधाएँ करवाई जैसे डॉक्टर, बच्चों के लिए दूध, बिस्तर, कम्बल इत्यादि |

इसके बाद हमारी रेलगाड़ी जालंधर पहुंची और हमें वहाँ उतार दिया और हमारे कई परिवार 1-2 साल तक जालन्धर रहे | इसके बाद हम गुड़गाँव कुछ समय तक रहे फिर रेवाड़ी गये और अंत में सन 1950 में हम महेंद्रगढ़ जिले में पहुंचे और अब तक महेंद्रगढ़ में रह रहे है | हमने यहाँ अपनी आजीविका चलाने के लिए कई व्यापार किये जैसे कि चाय बनाने का काम, बर्फ का काम, होटल चलाना, हार्डवेयर का काम | आज मेरे बेटा दर्शन खुराना ने वहाँ पर कपड़े का शोरूम बना रखा है और राधा-रानी के नाम से बाज़ार में नाम है |

 

1947, India

 

Translated by Google 

Viral Sach – Gurugram : 1947 – I live in Mahendragarh, son of Thakur Das Khurana, late Shri Punnu Ram Khurana. Mr. Ram Lal Grover and Mr. Jai Gopal Grover, who live in Gurugram, asked me to share the memories I had seen and heard in Pakistan before partition.

I want to tell you that I was born in village Bujare, Dera Ghazi Khan. I was 12 years old when I left Pakistan. Studied in Pakistan in 4th class. He used to teach there in Urdu. There we had a silver business and used to sell wooden boxes. After studying from school, I used to help my father in business.

There the Hakim, who is now a doctor, used to tell by looking at the pulse and clothes, what was the disease of the patient. It is not like today that first get all the tests done, still sometimes doctors do not understand what is the disease. From here, there the doctors were very good.

There there was no discrimination between the children of 8-10 years i.e. boys and girls. Everyone used to play together, there were games like rope jumping, swinging etc.

The favorite game of the Muslim community was “Doda”. Thousands of people used to gather to watch this game, similarly marriages were also celebrated there with pomp. Preparations used to start months in advance. Relatives from far off places used to come 15-20 days in advance. There was singing and music by the women at night. The son-in-law was often seen sulking these days. Elders used to start work only after persuading them.

There was no radio in the village in anyone’s house. Whenever I wanted to hear something, I had to go to the neighboring village. Newspapers were also available at some places. By the end of the day, many times I would get the message that there was an attack in the village. Many people got injured. Many got injured. A wave of sorrow used to run.

One night there was an attack in our colony, slogans of Pakistan Zindabad were heard loudly. All our neighbors gathered on the terrace and started thinking of going to a safer place. The SHO announced that all the Hindu families would reach Vahova and there they would be protected. The day of departure was fixed and we reached Wahowa under the supervision of the police.

There was tension in many places but our village remained almost calm and no major incident took place. After staying for a few days at Wahowa, we were brought to Dera Ghazi Khan in lorries. Our luggage was thoroughly searched to make sure that we were not carrying any weapons.

We family was allowed to take one trunk, one bed and one small sack of utensils. We came there leaving our business which was of silver and wooden box. At that time I had to save my life. Military soldiers were deployed for our security. From Muzaffargarh we were loaded into a train and sent to India.

It was a very sad and painful time. There was such a lack of trust and confidence that all of us in the train wondered whether we would reach India properly or not. The train was not given line clear for several hours.

There was a crowd of rioters on the platform, they had weapons. We were seeing our end. We started remembering God that now only God can save us from the slaughter. The in-charge of the military team acted judiciously and got the line cleared. When the train reached Attari, the people there, especially the Sikh community, warmly welcomed us and provided all the facilities like doctors, milk for children, beds, blankets etc.

After this our train reached Jalandhar and dropped us there and many of our families stayed in Jalandhar for 1-2 years. After this we stayed in Gurgaon for some time then went to Rewari and finally in 1950 we reached Mahendragarh district and till now we are living in Mahendragarh. Here we did many trades to earn our livelihood like tea making, ice making, hotel running, hardware work. Today my son Darshan Khurana has set up a clothes showroom there and is known in the market as Radha-Rani.

Follow us on Facebook 

Follow us on Youtube

Read More News 

Shares:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *