प्रेरक प्रसंग :- स्कूल चला घर

प्रेरक प्रसंग :- स्कूल चला घर

Annu Advt

दर्द की परत में दबी किताबों, आंसुओं के सैलाब में बहते अक्षर, मातम के चितकार में कराहती स्कूल की वर्दी, खूंटी पर टंगे बस्ते, जो कांधे पर डीसीटंगे होने चाहिए थे। कलम सहमी सिमटी,कॉपी ठिठकी पड़ी थी, स्कूल पर ताले जड़े थे,गलियों में मौत शोर मचा रही थी, चितकार गूंज रहे थे। यह दर्दे करोना था। अध्यापक से बच्चे दूर मिलने को बेताब थे, मोबाइल के झरोखे से झांकते बच्चों की बेबसी चेहरों पर चस्पा थी। बच्चे स्कूल नहीं आ सकते थे एक सवाल को बार-बार इतनी बार दोहराने पर आखिर खुद से खुद को जवाब मिल ही गया…सच है बच्चे स्कूल नहीं आ सकते पर स्कूल तो बच्चों के पास जा ही सकता है। इस जवाब ने मुझे रोमांचित कर दिया बच्चों से बात की एसएमसी की टीम से चर्चा,प्रधानाचार्य की अनुमति और फिर क्या स्कूल चला घर।

शिक्षक दिवस मेरे कदम रोके ना रुके बढ़ चले अपने विद्यालय की छात्राओं से मिलने, मलिन बस्ती की तंग सकरी गलियों में बिख री गंदगी से बेखबर बेपरवाह मुस्कुराते चेहरों से रूबरू होने का मन लिये फिर क्या कई महीनों बाद छोटे से घर के आंगन में विद्यालय सज गया, क्लास लग गई, पढ़ाई शुरू हो गई बच्चों के सवालों पर सवाल कुछ किताबी, तो कुछ सामाजिक कुछ दुनियावी भी ….स्कूल घर आया है यह संदेश धीरे-धीरे गली से मोहल्ले मोहल्ले से पूरी बस्ती में फैल गया ऐसा भी हो सकता है क्या? इस बात की तस्दीक में अभिभावक घरों से निकल आंगन में आ कर सिमट कर ठिठक गए, जहां बेटियां बैठ पढ़ाई करने में मगन थी।शारीरिक शिक्षा की पाठशाला में नोट बनाए गए, सवालों को समझाया गया, पाठ पढ़ाया गया, लोग उत्सुकता से निहारते, सराहते, मुस्कुराते सहमति देते रहे। अरसे बाद अध्यापक से मिल बेटियां भी खिल गई थी, इस बीच किसी जागरूक अभिभावक ने ये बात पत्रकार से सांझी कर दी कि “स्कूल घर आया है” कुछ पत्रकार भी आ गए आंगन में सिमटा विद्यालय मोहल्ले के स्कूल में तब्दील हो गया था अभिभावकों ने उत्साह से प्यार बरसाया और पत्रकारों ने प्रश्नों के बौछार।

क्यों आए हो आज इस बस्ती में जहां कदम कदम पर गंदगी है? आज शिक्षक दिवस है अध्यापक आज के दिन भी पढ़ाई से दूर, विद्यार्थियों के बिना, क्लास रूम से बाहर हो इस कल्पना ने ही सहमा दिया था। यह साहस,यह सोच, यह फैसला शिक्षक की शिक्षार्थियों को एक छोटी सी सौगात भर है ,अध्यापक धर्म का निर्वाहन मात्र ही है। बच्चों को कैसा लगा? मैंने कहा इस सवाल के हकदार विद्यार्थी हैं उनसे ही पूछ लीजिए जवाब आए… बेटियों ने कहा कि यह सपनों को के सच होने सरीखा मालूम होता है। तो किसी ने कहा कई महीने बाद बस्ते से कॉपी पेन बाहर निकले है, तो किसी ने बोला आज शिक्षक दिवस पर अपनी अध्यापक के साथ बैठना,पढ़ना, बात करना दिन को ताउम्र के लिए यादगार बना दिया। स्कूल प्रबंधन कमेटी के सदस्य ने कहा अध्यापक स्कूल में पढ़ाते हैं यह तो सुना भी है और देखा भी था। किंतु ऐसे नाजुक हालत में मैडम स्कूल के रूप में घर चल कर आ जाएंगी कभी सोचा भी नहीं था। इस साहस को सलाम यह अविश्वसनीय है अकल्पनीय है, यह स्वागत योग्य है। हर अध्यापक में यह भावना अगर भर जाए तो शिक्षा का स्तर बहुत बढ़ जाएगा।

बाते बहुत हुई, सवाल भी बहुत हुए और सबसे बड़ी बात यह रही कि एक छोटे से कदम ने कितने चेहरों को खुशी से भर दिया, कितनी राहों को मंजिल से जोड़ दिया, कितनी उम्मीदों को साकार स्वरूप दे दिया और कितने सवालों को जवाब। जज्बात छलक उठे.. अभिभावकों को शिक्षा का महत्व मालूम हो गया,तो समाज को सहयोग के मायने समझाएं प्रयास इतना ही था कि पढ़ाई जारी रहे, समाज सहयोगी बने, अभिभावक शिक्षा के सारथी एक ही प्रयास में तीनों बिंदु सार्थक हो सामने खड़े थे।उम्मीद से ज्यादा पाया इस छोटे से प्रयास में हौसला मिला कि आगे बढ़ोगे तो साथ ,सहयोग, सम्मान मिलेगा ही।

यह मेरे अध्यापक जीवन का एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं बार-बार दोहराती, हूं खुद से ही खुद को सिखाती हूं। यह घटना मुझे कुछ और नया कुछ और अलग कुछ और सहयोग करने को प्रेरित करती है यह एक अध्यापक का सरल प्रयास था जिसे विद्यार्थी, अभिभावक, एसएमसी ने मिलकर सफल बना दिया। आभार उन सभी का जिन्होंने साथ सहयोग दिया। यह साहस जिसने दिया उस मनीषी की कृतज्ञता के बिना सब अधूरा है। यह हौसला जो दिल्ली के अध्यापक में आया है यह दिल्ली सरकार की देन है,यह हमारे शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया का हम अध्यापकों पर भरोसा है तभी तो मैं कहती हूं शिक्षा का दिया, मनीष सिसोदिया।

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