1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

 

वैचारिक मंच के सभी सदस्यों का मैं हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ कि आपने मेरी पुरानी यादों को बताने का अवसर प्रदान किया, मेरा नाम शांति देवी है और मेरी आयु 90 वर्ष की है | जब भारत का विभाजन हुआ तब मेरी आयु 16 वर्ष के आसपास थी | हम परिवार सहित बहुत ही प्रसन्न रहते थे | हमारा गाँव सोकर तहसील तौंसा शरीफ़ जिला डेरा गाज़ी खान था भारत अविभाजित था | हमारे परिवार में मेरे पति स्व. श्री बोधराज गाबा, देवर श्री सोहनलाल तथा जवाहरलाल गाबा सभी संयुक्त परिवार के रूप में रहते थे | सारा परिवार बहुत खुशहाली से जीवन व्यतीत कर रहा था |bombay Jewellers

अचानक 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो हमे ज्ञात हुआ कि हमारा गाँव भारत विभाजित होने पर पाकिस्तान में आ गया है, हमें यह स्थान छोड़कर कहीं और जाना पड़ेगा | सारा परिवार बहुत दुखी हुआ कि यहाँ के सारे मित्रों को, जायदाद को छोड़कर कहीं और जाना पड़ेगा | हमारे परिवार ने व सभी अन्य परिवारों ने वह स्थान गाँव सोकर छोड़ने का निर्णय लिया | गाँव के सरपंच, वहाँ के थानेदार व पुलिस कर्मचारी सभी हमारी सहायता की और हम डी. जी. खान जिला छोड़कर आजाद भारत में रात के समय पहुंचे | यहाँ हमारे खाने पीने की अच्छी व्यवस्था थी |

ठहरने के लिए तम्बू लगाये हुए थे | हमारे परिवार को कैथल जिला अलाट हुआ | कुछ समय हम कैथल में रहे | बाद में गुड़गाँव जिले में हमें स्थानांतरित किया गया | गुड़गाँव में अर्जुन नगर की कच्ची कोठी दी गई | हमारे पूरे परिवार ने बहुत मेहनत की | आज प्रभु की कृपा से सब कुछ है | मेरे 4 पुत्र है, सुभाष गाबा, हरीश गाबा, देवेन्द्र गाबा, दिनेश गाबा व एक पुत्री सरोज है | सभी आज बहुत अच्छे से अपने परिवारों में खुश है और मैं हरीश के पास रहती हूँ और मैं आज बहुत खुश हूँ |

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