1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

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मैं, शकुंतला भाटिया, 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन से अपनी यात्रा और अनुभव साँझा करना चाहती हूं। मैं पाकिस्तान के मुल्तान शहर की नई बस्ती से संबंधित हूं, जो अब हांसी, हरियाणा में बस गई है। हम एक साथ रहने वाले 70-80 करीबी रिश्तेदारों के परिवार थे। हमारे यहां आम के बड़े-बड़े बाग, वृक्षारोपण आदि थे और जीवन अच्छा था। अब, जब मैं वापस याद करती हूं, तो मुझे लगता है कि उस दौरान पाकिस्तान में हमारा जीवन बहुत आरामदायक था। हम 7 भाई-बहन हैं और 3 का जन्म भारत आने के बाद हुआ है। कौन जानता था कि यह हमेशा के लिए नहीं रहेगा और चीजें पूरी तरह से बदल जाएंगी।

मैं 7 साल का थी जब भारत-पाकिस्तान विभाजन शुरू हुआ। पहले चरण में ही हमारे परिवार के 14 बुजुर्गों को मार डाला। हमारे कुछ पड़ोसी मुस्लिम परिवार बहुत सहयोगी थे, उन्होंने हमें हत्यारे जनता से छिपाने के लिए आश्रय भी दिया था। जब यह सब शुरू हुआ तो हमें यह कह कर ट्रेन से हरिद्वार भेज दिया गया कि हमें छुट्टी पर जाना चाहिए और हर की पौड़ी में डुबकी लगानी चाहिए। हमें नहीं पता था कि हमारे बुजुर्ग पाकिस्तान से भागकर भारत आ रहे हैं, ताकि हम वहां सुरक्षित रहें।

कौन जानता था कि आखिरी बार मैं अपना जन्म स्थान देखूंगी। हम परिवार के करीब पचास सदस्य थे जो भारत आए थे। यह सब जल्द ही समाप्त हो गया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। हमारे बुज़ुर्गों ने सारा सोना और क़ीमती सामान यह मानकर दीवारों में दबा दिया कि वे युद्ध खत्म होने के बाद लौट आएंगे लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।

हमारी सारी संपत्ति और सुंदर बाग नष्ट हो गए। हमारे बुजुर्ग बड़ी मुश्किल से जहाज से आए। पानीपत में बसने से पहले हमें हरिद्वार में शिविरों में रहना पड़ा और फिर हरियाणा में कई बार जगह बदली और फिर हांसी में मेरी शादी हुई। अब मैं उस समय के बारे में सोचती हूं,मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

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