1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

गुरूग्राम, (मनप्रीत कौर) : विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में लोग हिन्दू, सिख, मुसलमान सभी प्यार से रहते थे एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे कोई साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते थे | अपने – अपने धर्म पर चलने की पूरी आजादी थी | हिन्दू प्राय: श्री गुरु ग्रन्थ साहिब को मानते थे, मंदिर बहुत कम थे |

हिन्दू प्राय: व्यापार और खेतीबाड़ी करते थे | नाई, मोची, सफाई, छिडकाव, फसलों की कटाई, मजदूरी के सारे काम, मांस बेचना आदि काम लगभग सभी छोटे काम मुसलमान करते थे |

बड़ी और ऊँची शिक्षा के अवसर प्राय: कम थे | कॉलेज की पढाई तहसील या जिलों में होती थी | महंगाई कम थी और कमाई भी कम थी |

पड़ोसियों और रिश्तेदारों में प्यार था | बड़ो का आदर था और लोग मर्यादा में रहते थे | सवारी और सामान लाने ले जाने में घोड़े, गधे और ऊंट काम में लाये जाते थे | बसें, रेलगाड़ियाँ बहुत कम थी | लोग पैदल चलते या घोड़े, ऊंट कि सवारी करते थे |

शहर में दो या तीन वैद्य होते थे जो नाड़ी देख कर ईलाज करते थे | गाँव के लोग भी उन्ही के पास जाते थे | घरों में प्राय: दादी के नुस्खे चलते थे | दाईयां ही घर पर प्रसव कराती थी |

हिन्दुओं की संख्या कम और आने –जाने के साधनों का अभाव होने से युवक – युवतियों के विवाह निकट के गावों या उसी शहर में ही जाते थे | रिश्ते बनाने में ज्योतिष गणना और आपसी आर्थिक स्थिति पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था सामाजिक एवं धार्मिक मर्यादाओं के कारण परिवार संस्था सुदृढ़ थी | अभावों और कम साधनों के होते हुए भी आपसी सौहार्द के कारण लोग संतुष्ट थे |

मिठाई की दुकान कम देखने को मिलती थी | प्राय: प्रयोग में आने वाली मिठाई लड्डू, मट्ठी, गुजिया, तोशे, मरुंडे, मेसू, हलवा, मीठा दलिया, बर्फी, लोग गाजर का हलवा घर पर ही बना लेते थे | शादियों में भी मिठाई के आइटमों की अधिकता नहीं होती थी |
नहाने-धोने और कपड़े धोने नहर पर जाते थे, पीने का पानी भी वहीं से लाते थे | तालाबों से मिट्टी निकाल कर मकान बनाते थे, जो वातानुकूलित का भी काम करते थे | दूध-दही बेचे नहीं जाते थे | जरूरतमंद को निशुल्क दिए जाते थे | प्राय: सभी लोग दूध की आवश्यकता पूरी करने के लिए अपने घर दुधारू पालते थे | बच्चे मनोरंजन के लिए गिल्ली-डंडा खेलते थे या पतंग उड़ाते थे | स्कूल में फुटबाल और वालीबाल खेल का प्रचलन था | कबड्डी और कुश्ती लड़ना प्राय: मेलों में होता था | कस्बों में एक-दो वर्ष में कबीलाई लुटेरे पठान आते थे और हिन्दूओं के घरों में डाका डालकर मूल्यवान वस्तुएं, धन, आभूषण लूट कर ले जाते थे | लुटेरे के आने की सूचना सुनकर हिन्दू घर छोड़कर एक सुरक्षित स्थान पर इकट्ठे हो जाते थे | जहाँ कुछ हिन्दू घराने बंदूकें रखते थे | यदि कोई व्यक्ति उनके घर पर मिल जाता तो उसे धन और आभूषण बताने के लिए बहुत मारते-पीटते थे और परेशान करते थे | आजीविका का साधन और अचल सम्पति वहन होने से लोग लुटेरों का अत्याचार सहन करते थे | देश के बंटवारे की आहत सुनकर कुछ लोग सतर्क हो गये और अपनी मूल्यवान सम्पति लेकर परिवार सहित बंटवारे की घोषणा से पहले ही हिंदुस्तान अपने रिश्तेदारों के घर सुरक्षित पहुँच गये |

14-15 अगस्त रात्रि 1947 को देश के बंटवारे की घोषणा कर दी गयी | उत्तरी भारत में पंजाब एक बहुत बड़ा प्रान्त था | इसके पश्चिमी भाग में मुसलमानों का बाहुल्य था और हिन्दुओं की संख्या कम थी | अत: वह क्षेत्र पाकिस्तान मिला पश्चिमी पंजाब के हिन्दू इधर हिंदुस्तान के उत्तरी क्षेत्र में आये और इधर से मुसलमान पाकिस्तान भेजे गये | इतिहास में पहला ऐसा अवसर था कि शासकों केस साथ-2 प्रजा की भी अदला-बदली हुई |

इस परिवर्तन में आपसी वैमनस्य बढ़ा | सौहार्द की बजाय वैर हो गया | मार-काट हुई, जान-माल की हानि हुई | कई हिन्दू मातायें-बहनें विधवा हो गयी | उनकी प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाई गयी | एक भाई ने अपनी बहनों की अस्मिता बचाने के लिए स्वयं ही अपने हाथ से उनके सर धड़ से अलग कर दिए | बड़ा पीड़ादायी दृश्य था |

हम वहोवा कस्बे के रहने वाले थे | वहाँ से हमें जबरदस्ती ट्रकों में भरकर जिला डेरा गाजी खान में लाया गया | हम अपना सारा सामान घर के कमरों में बंद करके आये, आशा थी कि कुछ दिनों में वापिस घर आ जायेंगे | डेरा गाजी खान में कुछ दिन रहे | हुकूमत के फैसले के अनुसार हमें निकट के रेलवे स्टेशन मुजफ्फरगढ़ भेज दिया | वहाँ भेजने से पहले हमारी तलाशी लेकर हमारे पैसे और आभूषण ले लिए | दो-तीन दिन बाद मुजफ्फरगढ़ से रेल के डिब्बों में खचाखच भरकर हिंदुस्तान के लिए रवाना कर दिया गया | पहले जो गाड़ियाँ गयी थी, उनमें से कुछ रेलगाड़ियों में कुछ डिब्बों की सवारी मार गिराई थी | ऐसी अत्याचार की ख़बरें सुनकर दिल की धड़कने बढ़ जाती थी और साँस रुक जाती थी | अटारी से पहले हमारी रेल गाड़ी भी रोक ली गयी | ड्राईवर मुसलमान था | उसकी नीयत खराब हो गयी | मिलिट्री के सुरक्षाकर्मियों ने साहस दिखा कर उसे मार कर स्वयं गाड़ी चलाकर ले जाने की धमकी दी | तब कहीं वह गाड़ी चलाने को तैयार हुआ | लुधियाना रेलवे स्टेशन पहुंचकर गाड़ी खाली करा ली गयी | गैब कहीं सुख की साँस ली और जान में जान आई | कुछ दिन बाद निकट में जमालपुर गाँव के कैंप में भेज दिया | वहाँ दो से ढाई साल रहे | राशन मिलता रहा पर कहीं पढाई से वंचित रहे | पाकिस्तान के विभिन्न जिलों से आये लोगों को उत्तरी भारत में अलग-अलग जिलें नियुक्त करके वहाँ भेज दिया गया |

वहन से विभिन्न गांवों में भेजा गया और मुसलमानों द्वारा छोड़े गये खाली मकानों में रहने की इजाजत दे दी और गुजारे के लिए थोड़ी-थोड़ी जमीन अस्थाई रूप में बाँट दी | शहरों में लोगों को टेंटों में रहना पड़ा |

पाकिस्तान से हमारे मकान और जमीन के रिकार्ड आने पर अनुपात से हमें मकान और जमीन स्थाई रूप से दे दिए गये | हम अपने – अपने पैरों पर खड़े होने के लिए छोटे-मोटे घंधों में लग गये और पूर्णतया इस क्षेत्र के वासी हो गये | जीवन-स्तर में सुधार होने लगा और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में पूर्ण रूपेण से सहभागी हो गये |

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