1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

1947 के विभाजन का दर्द – बुजुर्गों की जुबानी

bombay Jewellersगुरूग्राम , (प्रवीन कुमार ) : 15 अगस्त 1947 में भारत वर्ष का बंटवारा हुआ और देश के दो टुकड़े हो गये, जिसमें एक को हिंदुस्तान और दूसरे को पाकिस्तान का नाम दिया गया | लेकिन इस बंटवारे में सदियों से साथ रह रहे हिन्दू-मुस्लिम में जो ख़ूनी संघर्ष हुआ उसका हम हिन्दू खासतौर पर पश्चिमी पंजाब में रहने वाले पंजाबी समाज को मौत का तांडव देखना पड़ा | उसको तो सुनकर रूह कांपने लगती है | लगभग 10 लाख पंजाबियों का या तो कत्लेआम कर दिया और या फिर मुसलमान बनने, मुस्लिम दर्म को ना कबूल ने के कारण हजारो, लाखों बहनों, भाईयों, बच्चों का, बुजुर्गों का बलिदान कर दिया |

जब देश का विभाजन हुआ मैं उस समय लगभग 6-7 साल का अबोध बच्चा ही था लेकिन मुझे आज भी याद है कि जब पुश्तों का घर-बार छोड़कर हमारा परिवार कुछ कपड़ो की गठड़ी देकर गाड़ी में बैठ रहा था तो उस समय मुसलमानों का एक जत्था हाथों में तलवारें लेकर हमारी गाड़ी में बैठे हुए लोगों पर टूट पड़ा और भीषण कत्लेआम मचा दिया और मेरे से बड़ी बहन शीलो जी गाड़ी की खिड़की से खींचकर सर कलम कर दिया और जब हमारे पिता जी के बड़े भाई लम्बर राम ने इसका विरोध करना चाहा तो उनको भी गाड़ी से उतार कर सिर कलम कर दिया | हालांकि गाड़ी चल पड़ी थी लेकिन जो कुछ भी हमारे पास था और उन मुस्लिम लुटेरों के हाथ लगा वह हम से छीन कर रफूचक्कर हो गये | मैंने एक अबोध और बेहद डरे हुए अबोध बालक के रूप में सारा मंजर अपने आँखों से देखा था | जिसकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप जाती है |

बंटवारे के बाद सबसे पहले हमें रिवाड़ी में उतारा गया मुझे याद है कि बीयाबान जंगल में टेंट लगे हुए थे और काफी मशक्कत के बाद हमें भी एक तम्बू मिल गया जिसमें ताया जी का परिवार, उनके तीन बेटें, घर वालियों के अलावा उनके तो पोते, हमारा परिवार, पिताजी, अम्मा जी, और हम चार भाई-बहन रहने लगे और हमें जो भी राशन मिलता था, ईंटों के चूल्हे पर खाना बनाकर किसी प्रकार से दो-तीन महीने बीते और तब 3 महीने बाद फिर हमें पलवल में शरणार्थी कैंप में भेज दिया गया |

जिले के अनुसार हम सबका फिर से बंटवारा हुआ | जैसे मियांवाली के लोगों को रिवाड़ी, डेरा गाजी खान जिले को पलवल, गुड़गाँव, झंग जिले को रोहतक, हांसी और हिसार, बन्नू-कोहाट को फ़रीदाबाद आदि | पाकिस्तान में जो बड़े शहरों में जैसे लाहौर, मुल्तान, मुजफ्फरगढ़, डेरा इस्माइल खान आदि शहरों में रहते थे और पढ़े-लिखे थे उन्होंने 15 अगस्त 1947 से पहले ही अख़बारों द्वारा, रेडियों द्वारा बंटवारे की ख़बरे पढ़कर पहले ही हिंदुस्तान के बड़े-बड़े शहरों जैसे दिल्ली, जयपुर, भोपाल, इंदौर में अपने परिवारों के लोगों को भेजना शुरू कर दिया था और बाद में जो लोग बस्तियों या गावों में रहते थे और 90% काश्तकारी या खेती का काम करते थे उन्हें यह सब दर्द ज्यादा झेलना पड़ा |

दिल्ली में भी किंग्सवे कैंप, विजय नगर में लाखों लोग आकर बसे और पुरुषार्थ से आज बहुत बड़े-बड़े बिज़नेसमैन बन गये | हमारा परिवार भी पलवल व फिर बाद में गुड़गाँव में आ कर बसा | बड़ी लम्बी कहानी है यदि लिखने बैठे तो एक किताब ही भर जाएगी |

बंटवारे के बाद हमारे बुजुर्गों का पहला काम रहा कि अपने बच्चों के लिए एक छत, उनके भोजन की व्यवस्था व बच्चों के लिए शिक्षा और इसके लिए हमारे बुजुर्गों ने क्या – क्या नहीं किया ? मजदूरी की, पल्लेदारी की, रिक्शा चलाये, चाय की दुकानें, सब्जी बेचना, कारखानों में मजदूरी व तो सब कुछ किया जिससे वह अपने परिवार का लालन-पालन कर सकें | मुझे याद है कि मैंने खुद सब्जी मंडी में धनिया – पुदीना बेचा, अपने पिता के साथ साबुन के कारखाने में मजदूरी की लेकिन वाह रे पंजाबी समाज के बहादुर लोगों, तुमने सब कुछ किया, लेकिन हाथ में ठुठा लेकर कभी भीख नहीं मांगी | हमारी माता ने लोगों के घर बर्तन मांजने से लेकर झाड़ू – पोछे का काम किया | हमें पाकिस्तानी, रिफ्यूजी, शरणार्थी कहकर पुकारा गया लेकिन हमारे पंजाबी भाईयों ने पुरुषार्थ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और आज हमें फर्क है कि जो लोग रिक्शा चलाते थे या बस या ट्रक ड्राईवर का काम करते थे वो आज बड़े-बड़े ट्रांसपोर्टर है, चाय बेचने वाला बड़े-बड़े होटलों का मालिक है और हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरे विश्व में हमारे पंजाबियों ने अपना एक अहम् स्थान बना लिया है |

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